घणी खम्मा

Monday, November 17, 2008

राजस्थान स्यूं सम्बन्ध

राजस्थान स्यूं म्हारा कै सम्बन्ध है? गणी बार सोचूं. म्ह तो ठीक से रजस्थानी लिख भी ना सकुं. पण म्हारो राजस्थान स्युं वो ही सम्बन्ध है जको एक जननी स्यूं हुव. या जको एक परणिज्योड़ी बेटी रो मा-बाप र घर स्यूं हुव.
जनम री भूमि खिंचे पण कर्मभूमि स्यूं तकदीर जूड़ेडी रेवे, ससरा जियां.

हर्याभर्या दरखत नीचे बैठ मरूभूमि न याद करां हां.....

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Friday, August 04, 2006

जसवंतसिंहजी ओ थे कांई कर्यो?

जसवंतसिंहजी ओ थे कांई कर्यो? एक पोथी बेचण वास्ते पार्टी र सागे खुद भी घिरग्या. आ थांरी पोथी बेचणा री चाल हैं या फेर कीं ओर ही हैं? म्हाने तो लागतो हो की थे कुटनीति रा जाणकार हो, पण ई बार तो चाल मांय फसग्या लागो हो. थे भाजपा रा मनमोहनसिंह हा पण मनमोहनसिंह न मुळकण रो मोको दे दिन्यो.
म्हाने तो लागे हैं कि जासुस जरूर हुणो चाहिजे, पण नाम नहीं बताण री थांरी मजबुरी कोनी समझ मं आ री. घणी खम्मा पार्टी स्युं केरों बेर काढो हो?

Saturday, July 08, 2006

राजस्थानी ने कोई गांधी मिलज्यातो तो...

राजस्थानी ने कोई गांधी मिलज्यातो तो आज वा भी भाषा री श्रेणी मांय आ ज्याती. राजस्थान मायं अलग अलग तरीका स्युं भाषा बोलिजे हैं. मेवाडी, मारवाड़ी वगेरे...
अठ तक की एक गाँव स्यं दुजे गाँव री बोली मायं फरक देखणने मिले. बोलो भलाईं अलग अलग पण जठतांणी भाषा रो मानकी करण हुवेलो राजस्थानी ने भाषा रो पद कंया मिल सके हैं.
हालत गुजराती री भी आय ही. आज भी सुरत री गुजराती सौराष्ट्र री गुजराती स्युं अलग हैं. भाषाउं ठा पड़ज्याव कि किस्या प्रांत रो मिनख हैं. पण लिखणा री-पढाई री गुजराती रो मानकीकरण हुयोडो हैं. एक दिन गांधीजी एक शबदकोष उठार बोल्या इने मान्य राखो. बस गुजराती रो मानकीकरण हुग्यो. इयांई राजस्थानी वास्ते हुए तो सारू.
थाने ठा हुए तो बताज्यो के राजस्थानी रो कोई शबदकोष बजार मं मिले हैं कि कोनी. एक छोटो सो शबदकोष म्हं बणा रीयो हुं, संजाल पर रखणा वास्ते. बेगो ही ळाणे ही कोशीष रेसी.

Tuesday, July 04, 2006

म्हारी बोली-म्हारी प्रित

खुद री बोली खुदरी ही हुवे, इकी होड दूजी कोई भाषा कोनी कर सके. मन्ने राजस्थानी भाषा रो ज्ञान इतोई हैं के आ मारा घर री बोली हैं. घर मं सघला राजस्थानी मं ही बोलां बस, बाकी सघलो वेवहार तो हिन्दी मं ही हुअ हैं. राजस्थानी पढ़ण रो काम भी कोनी पड्यो. पेली एक 'माणक' नामकी पत्रिका आती ही, अब राम जाणे बन्द हुगी या हाल भी छप हैं. जद देश मं हिन्दी रो ही ठिकाणो कोनी, तो राजस्थानी री गत तो कांई हुसी सोच ही सका हां.
ओ चिट्ठो म्हारी बोली ने मारा पगा-लागणा हैं.